बुधवार, 9 मार्च 2011

नियति

एक ख्वाब था मैं,
जिसे देखा उसने,
एक प्यार था मैं,
जिसे पाला था उसने
अपने सीने में,
एक गीत था मैं
जिसे सजाया था
उसने अपने होंठो पे ,
पर एक ख्वाब को
टूटना था और मैं टूट गया,
प्यार मिट जाना था,
और मैं मिट गया
गीत उतर जाना था लबों से
 और मैं  उतर गया ...

        और अब
अब मैं हूँ और उसकी यादें
उसकी हँसी और उसकी बाते
पर नहीं हैं अब वो कही
अब भी सताती हैं बाते उसकी अनकही
यही था नसीब मेरा
और मुकद्दर  मेरा
जिसे लिखा विधि ने मेरे हिस्से में

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

कुछ बातें जो यकीं दिलाती हैं कि पगला गया हूँ मैं

आज भारत आज़ाद हैं, अंग्रेज कबके चले गए , पर मानसिकता तो यही छोड़ गए , आज भी सरकारी दफ्तरों और अफसरों में वही अंग्रेजियत भरी हैं , आम आदमीं जैसे  ही सरकारी पेशे में जाता हैं वो  बड़ा अंग्रेज बन जाता हैं , वो खुद को आम से खास सझने लगता हैं और समाज से ये उम्मीद करता हैं की  समाज उससे खास व्यव्हार  करे .
जबकि समाज के उनसे काबिल और योग्य लोग  भरे हैं ,पर मौका नहीं मिलता  अब , किस्मत उनकी जो उन्हें सरकारी नौकरी मिली हैं ,
हर तरफ नारे लग रहे हैं देश के तरक्की के लिए , भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए , और ये आज़ादी  के बाद से से ही दूर किये जा रहे हैं , लेकिन ये विकास  और तरक्की सिर्फ चन्द लोगो के लिए हैं , आम  लोग , जो कल भी मजदूर थे , खेतिहर थे वो आज भी वही हाशिये पे धकेल दिए गए हैं . किसान मजदूरी करने शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं , जिनके मेहनत और पसीने से खेतो में अनाज उगता हैं और जिनके हाड तोड़ परिश्रम से बड़े - बड़े माल और इमारते बनायीं जाती हैं , उनसे ही हमारा शहरी  समाज घृणा करता हैं , रिक्शेवाले ,  दूध वाले और सब्जी वालो से देश के शहरी वर्ग का  अगर नाता  सहजीवता का आधुनिक रूप हैं , तो उसमे भी बहुराष्ट्रीय कंपनिया सेध लगा रही हैं , सब कुछ पैकेटो में आने लगा हैं , और देश के नेता और देशवासीयो को लगता हैं हम आधुनिक हो गए हैं ,  एक तो जनसँख्या की अधिकता ,और ऊपर से उनका  न तो समुचित दोहन हो रहा हैं न ही समुचित प्रबंधन  फिर भी विकास हो रहा हैं ?  चन्द लोगो के लिए , चन्द लोगो के द्वारा और चन्द हिस्सों में , ऐसे बनेगे हम विकसित देश , अपने ही संसाधनों को त्रिस्कार कर .
                              हम आज आधुनिक युग के आधुनिक लोग आधुनिक संसाधनों के उपभोगी , पर हम अपने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय  भाषा के उपयोग में हिचकते हैं , अपने  हर पारंपरिक  संस्कारो का  मजाक उड़ाते हैं , अपने परम्पराओं  और भाषा का उपयोग करने वाले पिछड़े गिने जाते हैं , आधुनिक भारतीय ब्रांडेड कपडे डालता हैं , अंग्रेजी बोलता हैं अपने बीवी और बच्चो से अंग्रेजी में बाते करता हैं , और दिखावे के लिए मंदिर जाता हैं , अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए जागरण करवाता हैं , श्रधा के लिए नहीं , सब बोलते हैं की " आई डोंट विलिव इन कास्ट सिस्टम " पर अब भी जातिवाद कायम हैं . कितने राजनीतिक पार्टियों की दुकान चल रही हैं इससे , और मौका दे रहे हैं हम आधुनिक लोग
           क्या भारत में भी वर्ग संघर्ष की नीव पड़ने लगी हैं ? ये आने वाली आधी सदी  में जातिवाद , क्षेत्रवाद और वर्गसंघर्ष  तय कर देंगे की भारतीय समाज की दशा और दिशा क्या होगी ?

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

जीवन यात्रा

सत्कर्म कीजिये , अपने परिवार, दोस्तों, को वक़्त दे उनके सुख दुःख में शामिल हो और अपने क्रोध पे नियंत्रण करने का प्रयास करे. प्रत्न्य रहे की अपने जानकारी में कोई भूका न सो पाए  किसी  की आँखों में हमारे वजह से आंसू  न आ जाये और हम किसी जीव  के कष्ट का कारण न बने . जीवन के छोटे छोटे लम्हों का आनंद ले ,बरखा की बौछारों का, शबनम  की बूंदों का, सूरज की किरणों का और चाँद की दुधिया रौशनी का भी, तो अमावस्या की अँधेरे का भी . सुख का तो दुःख भी प्रेम और नफरत दोनों का क्यों कि सब कुछ गुजर रहा हैं बहुत तेजी से और हमे पता तक नहीं चल रहा. हम मनुष्य हैं ,फिर पता नहीं क्या होंगे? कौन जाने इनका आन्नद लेने का और व्यक्त करने का मौका मिले न मिले . अपने प्रतेक दिन को यादगार बनाने की कोशिश करे , ईश्वर और पुरे मानव जाति और इस सृष्टी  के प्रति कृतज्ञ रहे जो, हमको  ये मौका मिला हैं ,ये किसी पूजा गृह में जाने  से अच्छा हैं की अपने मन -वचन और कर्म  को ही मंदिर सा पवित्र  रखे , शायद यहाँ से अलविदा लेते वक़्त सुकून रहे , जीवन का आनंद  ले तो मृत्यु के ले लिए हमेशा तैयार , बड़े बड़े काव्य , ग्रन्थ  लिख दिए गए , फिर भी मानव अब तक परेशां हैं , क्यों कि मानव ने लिखा और अपने अपने लिखे को श्रेष्ठ साबित करने में लगा रहा , पर यात्रा में  सब मुसाफिर होते हैं , कोई बड़ा कोई छोटा नहीं , किसी को सीट मिल जाती हैं तो किसी को नहीं मिलती , तो सफ़र को क्यों और कष्टमय बनाया जाये , सफ़र करते हैं ...

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

दो बुँदे

वो बुँदे न बरखा की थी ना
 ना शबनम  की
फिर भी गिर जाती है 
यदा कदा ,
नहीं जानते कहाँ से आ जाती है वो  नमी ,
 बना जाती है जो चेहरे  को सर्द और आँखों को सुखा , 
फिर हम जीने लगते है
 एक अधूरी ही दुनिया में जहाँ  न सपने हैं न उम्मीद की कोई किरण ,
फिर भी उसे  जीना हैं मुक़दर मेरा ..
ईश्वर  का अस्त्तिव तलाशते  तलाशते  खुद  गवा  बैठे अपना अस्तित्व , 
नहीं समझ में आती दुनिया की बाते ,
ढकोसले  ,और पाखंड ,
और वो  जीने नहीं देते  सादगी से ,

लोकतंत्र के छेद ,जो दिखते नहीं डुबोते हैं ..


छोटी छोटी बाते जो बहूत बड़ी हैं , पर इसके  लिए कोई न ही वैचारिक विमर्श होते हैं , न ही चर्चाये , १. हम जैसे युवाओ को किसी नौकरी के लिए फार्म भरना होता हैं तो हम अपने  प्रमाण पत्रों को किसी  राज पत्रित अधिकारी के पास निरिक्षण के लिए ले जाते हैं , कई बार ओ हमे जलील(अनेको प्रकार से कभी हमारी योगता पे सवाल लगा के , कभी दोस्तों या सहकर्मियों से बतियाते हुए और हमे इन्तजार करते हुए ) कर देते है तो कुछ लोग मूल अंक पत्रों से मिला के  हस्ताक्षर कर देते हैं , देखने में ये बहूत छोटी बात हैं पर इसका मंतव्य क्या हैं ? क्या सरकार को अपने ही खोले हुए विद्यालयों और विश्वविद्यालयओ  पे भरोसा   नहीं हैं , या  ये उन अध्यापको, उन संस्थाओ  का  परिहास नहीं हैं जिनके द्वारा पढाये  हजारो छात्र  आज देश की सेवा कर रहे हैं , और वो  भी कही राज पत्रित अधिकारी हैं .
जिनके कुलपति औरआचार्यो  और प्राचार्य  महोदय लोगो की विद्वता का लोहा दुनिया जान चुकी हैं . मेरे समझ से ये अंग्रेजो के ज़माने से आ रही परम्परा हैं जो उन्होंने भारतीय लोगो के लिए की होंगी , ताकि उनकी श्रेष्ठता बनी रहे , अगर आज के युग में दुनिया इतनी आधुनिक हो गई है तो सरकार को शैक्षिक प्रमाण पत्रों की विश्वनीयता के लिए कोई और कदम उठाना चाहिए .
२.अपने ही चित्र को किसी  राज पत्रित अधिकारी से प्रमाणित करवाना ,की ये मैं ही हूँ
3.अस्पतालों  में मरीज लोग पर्ची के लिए लाइन लगते हैं , मैंने  देखा  है कई बार ज्यादे  बीमार लोग जिनके साथ कोई नहीं होता वो  लाइन में लगे होते हैं और हलके फुल्के बीमार लोग  फटा फट पर्ची ले के  चले जाते हैं , सरकार का कर्तव्य , जैसा मैंने पढ़ा  हैं किताबो में  अपने नागरिको  का जीवन सरल बनाना है ,उलटे सरकार आम आदमी की जिंदगी को कष्टकर बना बैठी है,  अगर यही जीवन हैं तो स्कूलों  में पढाये जाने वाले उन  किताबो से इन निमयो , कानूनों  और नैतिकता  की बातो को निकल देना चाहिए . उन किताबो को जला देना चाहिए जो हमे सत्य , अहिंसा  , परोपकार और सभ्यता की बाते सिखाती हैं , क्यों की जीवन  में जब ये भ्रम टूटते है तो दुःख होता हैं और आदमी वही से भ्रष्ट होने लगता हैं
4.राशन कार्ड , ड्राइविंग लाइसेंस ,  वोटर कार्ड और जन्म - मृत्यु  प्रमाण पत्रों में (जिन्हें अक्सर  लोग दर्ज कराते ही नहीं , जो करवाते हैं उनके हाल ) गलत सूचनाये भर देना ( जैसे गलत नाम , पता , उम्र या माता पिता का नाम ) , फिर इनको ठीक करने के लिए  न्यायलय के शपथ  पत्र देना , की मैं ही वास्तविक व्यक्ति हूँ .
५.भारत देश जनसख्या के मामले में विश्व में दुसरे नंबर पे हैं  पर जनसख्या को नियंत्रित करने के लिए कोई व्यापक संसाधन नहीं , भारतीय रेलवे  से ले कर , सार्वजनिक जगहों तक , यहाँ तक की अब तो शोपिंग मालों  में भी अच्छी खासी भीड़ हो रही हैं  जहाँ  से किसी  दुर्घटना के वक़्त निकलना टेडी खीर हैं.

सोमवार, 17 जनवरी 2011

मेरी तकदीर

तुम चाँद हो
एक ख्वाब हो
एक किनारा
और मेरी तकदीर में
हैं बस
चाँद को ताकना
ख्वाब को सहेजना
और कश्ती का डूब जाना

तुम बरखा की बुँदे
और बसन्त का बाग़
मैं जेठ की धरती
और सुखी घास ....    

रविवार, 16 जनवरी 2011

मैं

कितने अलहदा हैं मेरे
हालत और ज़ज्बात
दुसरो से ..
हालत मेरे कुछ करने नहीं देते
ज़ज्बात मेरे चुप रहने नहीं देते ..
इसी कशमकश में ...
चार लफ्जों को ..
अफ़साने का शक्ल दे कर
हो जाता हूँ फ़ारिग

वक़्त

वक़्त बदल गया हैं,
पर ज़ज्बात वही हैं
उम्र बढ गई हैं
पर औकात वही हैं         
सोचता हूँ अब भी
उम्र गुजर गई रिश्तो- रस्मो
को निभाने में
पर रिश्तों की बात वही हैं
आज भी रिसते हैं ज़ख्म मेरे
क्यों कि रिश्तों की मार वही हैं

एक जज्बात

 गर्दिश इन्सा को क्या से क्या बना देता हैं,
 एक भावुक , संवेदनशील को मुर्दा बना देता हैं ,
 गर्दिशो में बने रिश्ते बड़े अनमोल हैं ,
तख्तो- ताज से कीमती उस वक़्त के मीठे बोल हैं ,
इंसा -इंसा  के काम आ जाये तो जीवन भी सफल हैं ,

जैसा मैंने भारत को देखा 

पेट में अन्न  का दाना नहीं हैं
सर पे तपती जेठ की दोपहरी हैं
और कंधे पे सीमेंट की बोरी हैं , 
दिन भर कमाने के बाद भी मिलती नहीं मजूरी हैं .
और इंडिया बसता  हैं ऊचे -२ घरो में
जहाँ  गर्मी और सर्दी का कोई फर्क नहीं ,
बरसात की कीचड़ कोई गर्क नहीं ,



लोग अर्पित कर आते हैं मंदिरों में करोडो रुपये,
और सोने -चांदी  के जेवर
अपने ईश्वर को खुश करने को
और उसी  के रचे बन्दों से करते हैं नफरत
कभी जाती , कभी धरम और कभी  गरीबी के नाम पर 
और अब तो ईश्वर को भी  कोई अफ़सोस नहीं हैं
उसको भी इन्सान का एक बहाना मिल गया हैं ,
और दुनिया को एक नया ज़माना  मिल गया हैं