व्यक्ति और स्थान का चरित्र वक़्त के साथ बदलता रहता हैं , लेकिन वो अपने पुराने स्वाभाव में कभी वापस नहीं आते ... लेकिन आत्मा का चरित्र वक़्त के साथ नहीं बदलता | जो सबन्ध आत्मा के स्तर पे कायम होते हैं वो भी जीवन भर नहीं बदलते चाहे वो किसी स्थान या व्यक्ति से हो ... और वक़्त के थपेड़ो में बिछड़े हुए जगह या व्यक्ति यादो में ही ठीक हैं क्योकि क्या पता दोबारा वहां जाने या मिलने पर उनका व्यव्हार और आवरण पूर्णतया परिवर्तित हो गया हो ... और ऐसा अकसर होता भी हैं , की कभी आपका जिगरी शहर या दोस्त अब वैसे नहीं रहे जो कभी पहले थे , शायद परिवर्तन ही सत्य हैं । जीवन चलने का नाम हैं .. इस यात्रा में बहुत सरे पड़ाव और मंजिले आती हैं , कुछ मिल जाता हैं कुछ खो जाता हाँ लेकिन मानव मन अपने आतीत से ही सुख का आनद लेता हैं । वर्तमान के दुःख भविष्य में आनंद और अनुभव दोनों देते हैं । आज का धोखा कल को आपका मार्गदर्शन करता हैं । और ठीक इसी तरह मनुष्य को अपने सिद्धांतों और आदर्शों का अपनों के द्वारा ही मजाक उड़ाने पर जो दुःख होता हैं वो मृत्यु तुल्य ही होता हैं , मूर्खो की संगती और रिश्तेदारी हमेशा आपको कष्ट में ही डालती हैं ... और जब आप मूर्खो से ही घिरे हो जिनके लिए किताबे सिर्फ कुछ शब्दकोष हो और अनुभव, शेखी तो पतन तो निश्चित ही हैं ।
जीवन के तमाम मुश्किलों को हल करने का एक छोटा सा प्रयास , अपने अनुभवों के साथ , प्रेम , जीवन , नौकरी और जीवन के विडंबनाओं के साथ सामंजस्य
मंगलवार, 19 मार्च 2013
बुधवार, 31 अक्टूबर 2012
विकाशशील
वर्तमान के राजनीतिक काल में कीचड़ से कीचड़ धोने का क्रम जारी हैं , आजादी
के बाद इस देश की जनता और आने वाली पीढियां क्या जन्म से ही इतनी बुरी थी
जैसी आज के समय में हैं | भारतीयता ,स्वालंबन , नैतिकता कहाँ चली गई हैं?
एक सच बोलो आप, उसे झुटा साबित करने के लिए तमाम लोग आ जायेंगे सच क्या
हैं, ये कहने वाला , सुनने वाला और विरोध करने वाले लोग भी जानते हैं |
साधारण सी बात हैं एक भारतीय भाषाओ को ले लीजिये , किस भारतीय भाषा में आप
निपुण हो के सम्मान जनक रोजगार पा सकते हैं , आप शुद्ध हिंदी बोल के
देखिये आपका मजाक उड़ाने वाले हजारो मिल जायेंगे | अब सब अलग दिखना चाहते
हैं बोल चाल में , पहनावे में | आप धोती कुर्ता पहन के निकलिए आपका मजाक
उडाया जायेगा | भारतीय अंग्रेज बनने चला हैं सिर्फ वेश भूषा बदल के ...
विचार बने हैं अंग्रेजो जैसे ? आप वैचारिक हैं , ईमानदार हैं, नैतिक हैं
तो १०० % आप मुर्ख हैं ......ऐसा युवा सोचता हैं आज का ... आँखे होते हुए
अंधे हैं.... कान होते हुए बहरे हैं ... ये खुलेंगे कैसे सिर्फ शिक्षित
होने से नहीं ... अपना इतिहास जानने से .. आजादी के पहले का इतिहास तो मिल
जाता हैं पढने को और उसके बाद का किसको फुर्सत हैं पढने का बस सुना हैं जी
इसने ये किया उसने वो किया ... बस बन गए हैं पार्टियों के समर्थक .. भाई
विचारधारा नाम की चीज़ ही नहीं बची हैं न पार्टियों के पास न ही लोगो के पास
, और कर रहे हैं इस देश का फैसला ... देश का नहीं अपने परिवार अपने वंश का
भविष्य बना रहे हैं देश का भविष्य कही जाये .. मजदुर का बेटा अब मजदुर ही
बनाया जायेगा .. कर्मचारी का बेटा कर्मचारी ही बनेगा वर्कर पैदा किये
जायेंगे ....साफ शब्दों में गुलाम .. और काले अंग्रेज बनेगे मालिक ... और
देश खुशहाल हो रहा हैं और होता रहेगा जी ... हम आज जिन्दा हैं कल निकल
लेंगे आने वाले जाने... सच बोलने वाले जेलों में डाले जायेंगे या फिर उनकी
जुबान बंद कर दी जाएगी ये सत्ता में आने वाला कोई भी कर सकता हैं जरुरी
नहीं हैं की वो कोई खास पार्टी का हो ... क्यों हम अपना कुछ नहीं बना रहे
आने वाले सदियों में पीढियां गर्व करे की हमारे पूर्वजो ने ये विरासत छोड़ी
हैं हमारे लिए , वे जो करेंगे ये ज़माना देखेगा .....हम उनके लिए क्या बना
रहे हैं ....
मंगलवार, 23 अगस्त 2011
बचपन
एक दिन ऐसे ही मेरा बचपन याद आ गया,
बच्चों को खेलते देख मेरा भी दिल ललचा गया ,
दिल में आया इनके साथ मैं भी जा के उधम मचाऊँ
दौड़ -दौड़ के इन पेड़ों पे चढ़ जाऊं ..
खेलु कुदू और थक जाऊं
न हो चिंता काम की ,
खूब दिन भर धमा -चौकड़ी लगाऊं
कही से आये मेरी माँ
और प्यार से मुझे बुलाये
और जब मैं ना आऊँ , तो दो प्यार के चपत लगाये
घर पे ला के अपने हाथों से खिलाये ....
फिर मुझे गोद में ही सुलाए
याद आ गया माँ का मुझे मारना ...
फिर गोद में ले के रोना और दुलारना ...
याद आई ..
दादा की सिखाई चौपाइयां
दादी के सुनाई कहानिया ...
पर अब न दादा हैं न दादी हैं ..
बस यादे उनकी बाकी हैं ..
पर अब बचपन वापस आ नहीं सकता
बीते लम्हे मैं पा नहीं सकता ..
हर शख्स में उसका बचपन जीता हैं ..
जीवन का हर लम्हा वो जीता हैं ..
पर ...
आज जो बुजुर्ग बेचारा हैं ..
कल वो भी किसी का दुलारा था ..
माँ का प्यारा और पिता की जान था
घर भर की शान था ...
कल हम भी बुजुर्ग बेचारे होंगे ..
वक्त के हाथो नकारे होंगे ?
बच्चों को खेलते देख मेरा भी दिल ललचा गया ,
दिल में आया इनके साथ मैं भी जा के उधम मचाऊँ
दौड़ -दौड़ के इन पेड़ों पे चढ़ जाऊं ..
खेलु कुदू और थक जाऊं
न हो चिंता काम की ,
खूब दिन भर धमा -चौकड़ी लगाऊं
कही से आये मेरी माँ
और प्यार से मुझे बुलाये
और जब मैं ना आऊँ , तो दो प्यार के चपत लगाये
घर पे ला के अपने हाथों से खिलाये ....
फिर मुझे गोद में ही सुलाए
याद आ गया माँ का मुझे मारना ...
फिर गोद में ले के रोना और दुलारना ...
याद आई ..
दादा की सिखाई चौपाइयां
दादी के सुनाई कहानिया ...
पर अब न दादा हैं न दादी हैं ..
बस यादे उनकी बाकी हैं ..
पर अब बचपन वापस आ नहीं सकता
बीते लम्हे मैं पा नहीं सकता ..
हर शख्स में उसका बचपन जीता हैं ..
जीवन का हर लम्हा वो जीता हैं ..
पर ...
आज जो बुजुर्ग बेचारा हैं ..
कल वो भी किसी का दुलारा था ..
माँ का प्यारा और पिता की जान था
घर भर की शान था ...
कल हम भी बुजुर्ग बेचारे होंगे ..
वक्त के हाथो नकारे होंगे ?
शनिवार, 6 अगस्त 2011
कुछ भूली बिसरी यादें - 1
मैं आज भी फिल्मे देखता हूँ , मुझे पिक्चर हाल का अँधेरा अच्छा लगता हैं , पर अब ओ बाते नहीं हैं जो पहले हुआ करती थी , उस वक़्त हमारे कस्बे में एक ही टाकिज हुआ करता था , तीन रुपये पचीस पैसे के टिकेट में दोस्तों के साथ छुप छुप के फिल्मे देखने में जो मजा आता था, वो अब किसी भी सुरत-ए- हाल में नहीं आ सकता, वो सीटियाँ बजानी और उछलना , अपने -अपने हीरोज के लिए लड़ना और अंत में दोस्तों के हाँ में हाँ मिलाना हाँ तेरा भी ठीक हैं | वो फिल्मे शुरू होने से पहले की तीन ट्रीन- ट्रीन घंटियाँ , और फिल्म शुरु होते ही हॉल में फैलता गहरा सन्नाटा , क्या बात होती थी जी | हमने फिल्मे देखनी कब से शुरु की इसका कुछ अंदाज़ा नहीं होता , क्यों कि मेरे फुफेरे भाई लोग थे , तीन बुआओं के चार लड़के, वे हमारे ही घर रहा करते थे, यानि अपने मामा के यहाँ और घर में सिर्फ हम थे और मेरे दादा - दादी| वे लोग मुझे ले के जाते थे अक्सर कभी कोई और कभी कोई | इस तरह से फिल्मे देखने की आदत लगी और ऐसी लगी की आज टी. वी. पर आने वाली हर फिल्मे देखी ही होती हैं , हाँ अपवाद स्वरूप कुछ नई हैं जिनके लायक मैं खुद को नहीं समझता | वो स्कुल का वक़्त क्या वक़्त था , पुरे हफ्ते जेब खर्च के पैसे बचा के हर रविवार को फिल्मे देखनी और सोमवार को स्कुल में दोस्तों के साथ कहानी बताना , और मजे की बात ये की किसी सीन को अपने हिसाब से ही परोसना | मैंने अक्सर स्कुल के वक़्त फिल्मे या तो अकेले ही देखी या अपने से उम्र में बड़े लोगो के साथ , और इस काम के लिए मैंने ऐसे लोग पटाये थे जिनपे कोई श़क न करे और घर में मार न पड़े , कमल के लोग होते थे वे , कभी कोई कस्बे का रिक्शे वाला , तो कोई सब्जी वाला , तो कोई ठेले वाला क्योंके मैं होता था छोटा और एक अच्छे परिवार से तो पिक्चर हाल में लोग मुझे पहचान जाते थे और घर में शिकायत चली जाती थी, तो मैंने रात के शो देखने शुरु किये इनके साथ इनके साथ किसी किस्म का कोई डर नहीं होता था , ये लोग खुद दबंग टाइप हीरो जो थे | जब हम आठवी पास कर के इंटर कालेज में गये तो तब तो हमारे पंख ही लग गए , उस वक़्त पहला प्यार जो था वो फिल्मे ही थी , इसी बीच घर में टीवी का आगमन हो चूका था पर हमे मनाही थी टीवी देखने की हम सिर्फ समाचार देख सकते थे और कभी चित्रहार और रंगोली , टीवी के किस्से बाद में अभी फिल्मे , हाँ घर में मेरे दादा जी के ओर से सख्त हिदायत थी की शाम के वक़्त रेडियो पे बीबीसी के समाचार सारे भाई लोग सुनेगे | तो जी पढने में हम कोई डफर भी नहीं थे , अच्छे खासे विद्यार्थी थे ही, अब अपने हिसाब से , मार्कशीट में भी यही लिखा हैं भाई | कालेज में तो लगे हाथ खूब सारे दोस्त बने कुछ खास और कुछ कामचलाऊ , फिर तो जी अब हमने बंक मार - मार के भी फिल्मे देखनी भी शुरु की और हमारा दायरा भी बढ गया , अब हम आस पास के नजदीकी कस्बो में भी जाने लगे , अब दोस्तों के साथ फिल्मे देखने , जेब तो उतने पैसे होते नहीं थे और अब हमारी गुस्ताखियों पे एक्शन भी कड़ा लिया जाता घर में तो अब हम बड़े सावधानी से गायब हुआ करते , दिन में फिल्मे देख के आना और जी रात को करनी पढाई | लोग कहते हैं की फिल्मे बच्चो को आवारा बना देती हैं पर हम तो नहीं बने आवारा ? आज उस ग्रुप के जितने भी थे मैं भी, सारे सफल हैं अपने अपने सफलता के मापदंडो और अपने माता -पिता के, क्यों की हम लोग ठहरे कस्बाई सोच वाले इन्सान , इतना ऊँचा नहीं सोचा जो मिल न सके | हाँ इतना तो तय हैं, उन फिल्मो से दुनिया को देखने और समझने का एक नजरिया जरुर विकसित हो गया हममे .... अच्छाई और बुराइयाँ तो हर तरफ बिखरी पड़ी हैं दोस्त अब ये हमपे निर्भर करता हैं की हम घर लाते क्या हैं .... तो फिल्म अभी बाकि हैं मेरे दोस्त ....
(अगली बार रेडियो के किस्से )
(अगली बार रेडियो के किस्से )
सोमवार, 20 जून 2011
सपनीले विचार
क्या सरकारी स्कूलों में राजनेताओ , उद्योगपतियों ,सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के भेजने से समाज और स्कूलों के व्यवस्था में परिवर्तन नहीं हो सकता , अगर हो सकता हैं तो वे क्यों नहीं भेजते ? अगर उनको वास्तव में इस देश की चिंता हैं , तो वे सरकारी अस्पतालों में जाएँ , सरकारी दफ्तरों में खुद जाये | इसका असर भारत के प्रगति में अवश्य पड़ेगा और भ्रष्टाचार से लड़ने में सहायक होगा |
आज भारत भूमि को पुनः एक पुनर्जागरण की आवश्यकता हैं , एक बार और कबीर की जरुरत आन पड़ी हैं जो समाज को वास्तविक ज्ञान और अपने अतीत और वर्तमान से सामंजस्य बैठाना बताये| छोटे परदे के बाबा लोगो के प्रवचन के अलावा जीवन और समाज की कटु सचाइयों से अवगत कराये और आम जनता को भी "दया धर्म को मूल हैं" को आत्मसात करना होगा और कोई मंदिरों के कतारबद्ध लोगो में चेतना का जागरण कराये कि , कर्म -और धर्म में दिखावा छोड़ के आम जीवन में जीवों के प्रति, समाज के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करे |
आधुनिकता विचारो से जनम लेती हैं न कि पहनावे से , इस तरह से कोई भारतीय रहन -सहन और परिधानों पे इन्हें गर्व करना सिखाये ताकि आने वाले जेनरेशन एक हिन्दुस्तानी होने पर गर्व कर सके और उनके पास भी अपना कुछ गर्व करने लायक अतीत हो | क्या आने वाली नस्लों को ये पढना होगा कि एक लोकतान्त्रिक देश में कैसे रात के साये में कुछ सोये हुए लोगो पर जुल्म हुए , राजनीती शास्त्र में घोटालो के बारे शिक्षा दी जाएगी | हम आधुनिक तो होते जा रहे हैं लेकिन हमारे मनीषी और विद्वान लोग कुछ ऐसा नया नहीं खोज पा रहे हैं जिससे वर्तमान पीढ़ी का जीवन सरल और सुगम हो और मानवता हमे याद कर,अगर ऐसा हो भी रहा हैं तो ये आम लोगो तक नहीं पहुच पा रहा , शायद अब आम जनता के बारे कोई नहीं सोचता | राजनेता, वैज्ञानिक , लेखक अब अपना अपना जीवन वृत्ति सँभालने में लगे हैं , देश के लिए और समाज के लिए कोई सपना नहीं हैं , अगर हैं भी तो वे लोग उसे ठीक तरीके से आम जन तक नहीं पंहुचा रहे | देश का आम आदमी आज दिग्भर्मित हैं , भविष्य कुछ साफ़ नहीं नज़र आता कि हम किस क्षेत्र में प्रगति कर रहे हैं , वैसे तो हमारे हुक्मरान बता तो रहे हैं कि हम चौमुखी विकास कर रहे हैं पर आम आदमी का विकास उनके विकास से अलग हैं | आम आदमी को अस्पताल में दवाइयां , रोज़गार के साधन , सड़के और अपराध मुक्त समाज चाहिए न कि मोबाएल फोंस |
रिअलिटी शो के आडिशन के लिए उमड़ती नवजवानों के भीड़ इस बाज़ार कि तस्वीर हैं , और कम्पनियों को ये बाज़ार प्यारा हैं न कि उनका टैलेंट | और आज इन्ही बाजारू चमक दमक में भारतीय सोच और दर्शन कही दबा सा महसूस हो रहा हैं , और आज फिर से भारत को एक कबीर , स्वामी विवेकानंद , और महात्मा गाँधी , कि जरुरत हैं | परिस्थितियां ही मानव व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं तो क्या पता समय ऐसे ही व्यक्तित्व कि रचना कही कर रहा हो , पर इस वक़्त हिंदुस्तान को ऐसे शख्स कि सख्त जरुरत हैं |
आज भारत भूमि को पुनः एक पुनर्जागरण की आवश्यकता हैं , एक बार और कबीर की जरुरत आन पड़ी हैं जो समाज को वास्तविक ज्ञान और अपने अतीत और वर्तमान से सामंजस्य बैठाना बताये| छोटे परदे के बाबा लोगो के प्रवचन के अलावा जीवन और समाज की कटु सचाइयों से अवगत कराये और आम जनता को भी "दया धर्म को मूल हैं" को आत्मसात करना होगा और कोई मंदिरों के कतारबद्ध लोगो में चेतना का जागरण कराये कि , कर्म -और धर्म में दिखावा छोड़ के आम जीवन में जीवों के प्रति, समाज के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करे |
आधुनिकता विचारो से जनम लेती हैं न कि पहनावे से , इस तरह से कोई भारतीय रहन -सहन और परिधानों पे इन्हें गर्व करना सिखाये ताकि आने वाले जेनरेशन एक हिन्दुस्तानी होने पर गर्व कर सके और उनके पास भी अपना कुछ गर्व करने लायक अतीत हो | क्या आने वाली नस्लों को ये पढना होगा कि एक लोकतान्त्रिक देश में कैसे रात के साये में कुछ सोये हुए लोगो पर जुल्म हुए , राजनीती शास्त्र में घोटालो के बारे शिक्षा दी जाएगी | हम आधुनिक तो होते जा रहे हैं लेकिन हमारे मनीषी और विद्वान लोग कुछ ऐसा नया नहीं खोज पा रहे हैं जिससे वर्तमान पीढ़ी का जीवन सरल और सुगम हो और मानवता हमे याद कर,अगर ऐसा हो भी रहा हैं तो ये आम लोगो तक नहीं पहुच पा रहा , शायद अब आम जनता के बारे कोई नहीं सोचता | राजनेता, वैज्ञानिक , लेखक अब अपना अपना जीवन वृत्ति सँभालने में लगे हैं , देश के लिए और समाज के लिए कोई सपना नहीं हैं , अगर हैं भी तो वे लोग उसे ठीक तरीके से आम जन तक नहीं पंहुचा रहे | देश का आम आदमी आज दिग्भर्मित हैं , भविष्य कुछ साफ़ नहीं नज़र आता कि हम किस क्षेत्र में प्रगति कर रहे हैं , वैसे तो हमारे हुक्मरान बता तो रहे हैं कि हम चौमुखी विकास कर रहे हैं पर आम आदमी का विकास उनके विकास से अलग हैं | आम आदमी को अस्पताल में दवाइयां , रोज़गार के साधन , सड़के और अपराध मुक्त समाज चाहिए न कि मोबाएल फोंस |
रिअलिटी शो के आडिशन के लिए उमड़ती नवजवानों के भीड़ इस बाज़ार कि तस्वीर हैं , और कम्पनियों को ये बाज़ार प्यारा हैं न कि उनका टैलेंट | और आज इन्ही बाजारू चमक दमक में भारतीय सोच और दर्शन कही दबा सा महसूस हो रहा हैं , और आज फिर से भारत को एक कबीर , स्वामी विवेकानंद , और महात्मा गाँधी , कि जरुरत हैं | परिस्थितियां ही मानव व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं तो क्या पता समय ऐसे ही व्यक्तित्व कि रचना कही कर रहा हो , पर इस वक़्त हिंदुस्तान को ऐसे शख्स कि सख्त जरुरत हैं |
सोमवार, 13 जून 2011
कुछ अपनी - कुछ दुनिया की
कोई देवदूत भी नहीं आता ,
दुनिया के करोड़ों मज़लूम इंसानों तक
जो भूख -लाचारी , गरीबी ,
युद्ध और आतंक के साये में जी रहे हैं अब तक,
इनके आलावा वो भी हैं जिनकी चेतना छीन ली हैं किसी ने ,
जिन्हें दुनिया कहती हैं पागल, और देती हैं दुत्कार ,
जब जरुरत हैं उनको प्यार की ,
इबादतगाहों से झाँकता नहीं हैं कोई
अब इनका हाल जानने को,
उन्हें भी हैं किसी मसीहा की तलाश औरो से ज्यादे ,
पर शायद नहीं हैं ईश्वर ,खुदा के पास फुर्सत ,
अरे हाँ पहले भी कहाँ थी फुर्सत इनके पास,
जन्म से लेकर मृत्यु तक डराने की चीज़ रहे हैं ये ,
इनका खौफ सिर्फ गरीबो और मज़लूमो को ही होता हैं ,
जिनके पास हैं ताकत और दौलत वो इनसे कब डरे हैं, जो अब डरेंगे ,
फिर वो क्यों न अपनी तिजोरियां भरेंगे ,
और जिन्हें अपने पेट भरने को मिलती नहीं रोटी
वो कहाँ से अर्पित करंगे सोने - चाँदी और हीरे की श्रद्धा मोटी ,
जनम से लेकर अब तक जिनका जीवन दुनिया के असमानताओ में गुज़र रहा हैं
शायद मौत का ख्याल भी उनके जेहन से उतर गया हैं ..
क्यों की लाखो की जिंदगियां अब भी मौत से बदतर है ,
पर दुनिया तो ऐसे अरबों को बनाने में ही तत्पर हैं ...
दुनिया के करोड़ों मज़लूम इंसानों तक
जो भूख -लाचारी , गरीबी ,
युद्ध और आतंक के साये में जी रहे हैं अब तक,
इनके आलावा वो भी हैं जिनकी चेतना छीन ली हैं किसी ने ,
जिन्हें दुनिया कहती हैं पागल, और देती हैं दुत्कार ,
जब जरुरत हैं उनको प्यार की ,
इबादतगाहों से झाँकता नहीं हैं कोई
अब इनका हाल जानने को,
उन्हें भी हैं किसी मसीहा की तलाश औरो से ज्यादे ,
पर शायद नहीं हैं ईश्वर ,खुदा के पास फुर्सत ,
अरे हाँ पहले भी कहाँ थी फुर्सत इनके पास,
जन्म से लेकर मृत्यु तक डराने की चीज़ रहे हैं ये ,
इनका खौफ सिर्फ गरीबो और मज़लूमो को ही होता हैं ,
जिनके पास हैं ताकत और दौलत वो इनसे कब डरे हैं, जो अब डरेंगे ,
फिर वो क्यों न अपनी तिजोरियां भरेंगे ,
और जिन्हें अपने पेट भरने को मिलती नहीं रोटी
वो कहाँ से अर्पित करंगे सोने - चाँदी और हीरे की श्रद्धा मोटी ,
जनम से लेकर अब तक जिनका जीवन दुनिया के असमानताओ में गुज़र रहा हैं
शायद मौत का ख्याल भी उनके जेहन से उतर गया हैं ..
क्यों की लाखो की जिंदगियां अब भी मौत से बदतर है ,
पर दुनिया तो ऐसे अरबों को बनाने में ही तत्पर हैं ...
सोमवार, 4 अप्रैल 2011
मजबूरी
ज़ज्बातो को हर किसी से बाँटा नहीं करते ,
बात दिल की हर वक़्त जुबान पे लाया नहीं करते,
हमने देखा हैं साहिल पे कश्तियों को डुबते,
दोस्ती - दोस्त की कभी आजमाया नहीं करते,
वो कहते हैं हम शख्स नहीं भरोसे के,
पर वो राज़ हमसे कोई छुपाया नहीं करते ,
कुर्बान कर दी ज़िन्दगी हमने दोस्ती पे,
पर अक्सर वो दोस्ती निभाया नहीं करते ,
सौदा नींद का कर दिया बिस्तर ने गैरों से ,
अब ख्वाबो में हम किसी के जाया नहीं करते....
बात दिल की हर वक़्त जुबान पे लाया नहीं करते,
हमने देखा हैं साहिल पे कश्तियों को डुबते,
दोस्ती - दोस्त की कभी आजमाया नहीं करते,
वो कहते हैं हम शख्स नहीं भरोसे के,
पर वो राज़ हमसे कोई छुपाया नहीं करते ,
कुर्बान कर दी ज़िन्दगी हमने दोस्ती पे,
पर अक्सर वो दोस्ती निभाया नहीं करते ,
सौदा नींद का कर दिया बिस्तर ने गैरों से ,
अब ख्वाबो में हम किसी के जाया नहीं करते....
बुधवार, 9 मार्च 2011
नियति
एक ख्वाब था मैं,
जिसे देखा उसने,
एक प्यार था मैं,
जिसे पाला था उसने
अपने सीने में,
एक गीत था मैं
जिसे सजाया था
उसने अपने होंठो पे ,
पर एक ख्वाब को
टूटना था और मैं टूट गया,
प्यार मिट जाना था,
और मैं मिट गया
गीत उतर जाना था लबों से
और मैं उतर गया ...
जिसे देखा उसने,
एक प्यार था मैं,
जिसे पाला था उसने
अपने सीने में,
एक गीत था मैं
जिसे सजाया था
उसने अपने होंठो पे ,
पर एक ख्वाब को
टूटना था और मैं टूट गया,
प्यार मिट जाना था,
और मैं मिट गया
गीत उतर जाना था लबों से
और मैं उतर गया ...
और अब
अब मैं हूँ और उसकी यादें
उसकी हँसी और उसकी बाते
पर नहीं हैं अब वो कही
अब भी सताती हैं बाते उसकी अनकही
यही था नसीब मेरा
और मुकद्दर मेरा
जिसे लिखा विधि ने मेरे हिस्से में
अब मैं हूँ और उसकी यादें
उसकी हँसी और उसकी बाते
पर नहीं हैं अब वो कही
अब भी सताती हैं बाते उसकी अनकही
यही था नसीब मेरा
और मुकद्दर मेरा
जिसे लिखा विधि ने मेरे हिस्से में
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011
कुछ बातें जो यकीं दिलाती हैं कि पगला गया हूँ मैं
आज भारत आज़ाद हैं, अंग्रेज कबके चले गए , पर मानसिकता तो यही छोड़ गए , आज भी सरकारी दफ्तरों और अफसरों में वही अंग्रेजियत भरी हैं , आम आदमीं जैसे ही सरकारी पेशे में जाता हैं वो बड़ा अंग्रेज बन जाता हैं , वो खुद को आम से खास सझने लगता हैं और समाज से ये उम्मीद करता हैं की समाज उससे खास व्यव्हार करे .
जबकि समाज के उनसे काबिल और योग्य लोग भरे हैं ,पर मौका नहीं मिलता अब , किस्मत उनकी जो उन्हें सरकारी नौकरी मिली हैं ,
हर तरफ नारे लग रहे हैं देश के तरक्की के लिए , भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए , और ये आज़ादी के बाद से से ही दूर किये जा रहे हैं , लेकिन ये विकास और तरक्की सिर्फ चन्द लोगो के लिए हैं , आम लोग , जो कल भी मजदूर थे , खेतिहर थे वो आज भी वही हाशिये पे धकेल दिए गए हैं . किसान मजदूरी करने शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं , जिनके मेहनत और पसीने से खेतो में अनाज उगता हैं और जिनके हाड तोड़ परिश्रम से बड़े - बड़े माल और इमारते बनायीं जाती हैं , उनसे ही हमारा शहरी समाज घृणा करता हैं , रिक्शेवाले , दूध वाले और सब्जी वालो से देश के शहरी वर्ग का अगर नाता सहजीवता का आधुनिक रूप हैं , तो उसमे भी बहुराष्ट्रीय कंपनिया सेध लगा रही हैं , सब कुछ पैकेटो में आने लगा हैं , और देश के नेता और देशवासीयो को लगता हैं हम आधुनिक हो गए हैं , एक तो जनसँख्या की अधिकता ,और ऊपर से उनका न तो समुचित दोहन हो रहा हैं न ही समुचित प्रबंधन फिर भी विकास हो रहा हैं ? चन्द लोगो के लिए , चन्द लोगो के द्वारा और चन्द हिस्सों में , ऐसे बनेगे हम विकसित देश , अपने ही संसाधनों को त्रिस्कार कर .
हम आज आधुनिक युग के आधुनिक लोग आधुनिक संसाधनों के उपभोगी , पर हम अपने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय भाषा के उपयोग में हिचकते हैं , अपने हर पारंपरिक संस्कारो का मजाक उड़ाते हैं , अपने परम्पराओं और भाषा का उपयोग करने वाले पिछड़े गिने जाते हैं , आधुनिक भारतीय ब्रांडेड कपडे डालता हैं , अंग्रेजी बोलता हैं अपने बीवी और बच्चो से अंग्रेजी में बाते करता हैं , और दिखावे के लिए मंदिर जाता हैं , अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए जागरण करवाता हैं , श्रधा के लिए नहीं , सब बोलते हैं की " आई डोंट विलिव इन कास्ट सिस्टम " पर अब भी जातिवाद कायम हैं . कितने राजनीतिक पार्टियों की दुकान चल रही हैं इससे , और मौका दे रहे हैं हम आधुनिक लोग
क्या भारत में भी वर्ग संघर्ष की नीव पड़ने लगी हैं ? ये आने वाली आधी सदी में जातिवाद , क्षेत्रवाद और वर्गसंघर्ष तय कर देंगे की भारतीय समाज की दशा और दिशा क्या होगी ?
जबकि समाज के उनसे काबिल और योग्य लोग भरे हैं ,पर मौका नहीं मिलता अब , किस्मत उनकी जो उन्हें सरकारी नौकरी मिली हैं ,
हर तरफ नारे लग रहे हैं देश के तरक्की के लिए , भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए , और ये आज़ादी के बाद से से ही दूर किये जा रहे हैं , लेकिन ये विकास और तरक्की सिर्फ चन्द लोगो के लिए हैं , आम लोग , जो कल भी मजदूर थे , खेतिहर थे वो आज भी वही हाशिये पे धकेल दिए गए हैं . किसान मजदूरी करने शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं , जिनके मेहनत और पसीने से खेतो में अनाज उगता हैं और जिनके हाड तोड़ परिश्रम से बड़े - बड़े माल और इमारते बनायीं जाती हैं , उनसे ही हमारा शहरी समाज घृणा करता हैं , रिक्शेवाले , दूध वाले और सब्जी वालो से देश के शहरी वर्ग का अगर नाता सहजीवता का आधुनिक रूप हैं , तो उसमे भी बहुराष्ट्रीय कंपनिया सेध लगा रही हैं , सब कुछ पैकेटो में आने लगा हैं , और देश के नेता और देशवासीयो को लगता हैं हम आधुनिक हो गए हैं , एक तो जनसँख्या की अधिकता ,और ऊपर से उनका न तो समुचित दोहन हो रहा हैं न ही समुचित प्रबंधन फिर भी विकास हो रहा हैं ? चन्द लोगो के लिए , चन्द लोगो के द्वारा और चन्द हिस्सों में , ऐसे बनेगे हम विकसित देश , अपने ही संसाधनों को त्रिस्कार कर .
हम आज आधुनिक युग के आधुनिक लोग आधुनिक संसाधनों के उपभोगी , पर हम अपने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय भाषा के उपयोग में हिचकते हैं , अपने हर पारंपरिक संस्कारो का मजाक उड़ाते हैं , अपने परम्पराओं और भाषा का उपयोग करने वाले पिछड़े गिने जाते हैं , आधुनिक भारतीय ब्रांडेड कपडे डालता हैं , अंग्रेजी बोलता हैं अपने बीवी और बच्चो से अंग्रेजी में बाते करता हैं , और दिखावे के लिए मंदिर जाता हैं , अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए जागरण करवाता हैं , श्रधा के लिए नहीं , सब बोलते हैं की " आई डोंट विलिव इन कास्ट सिस्टम " पर अब भी जातिवाद कायम हैं . कितने राजनीतिक पार्टियों की दुकान चल रही हैं इससे , और मौका दे रहे हैं हम आधुनिक लोग
क्या भारत में भी वर्ग संघर्ष की नीव पड़ने लगी हैं ? ये आने वाली आधी सदी में जातिवाद , क्षेत्रवाद और वर्गसंघर्ष तय कर देंगे की भारतीय समाज की दशा और दिशा क्या होगी ?
मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011
जीवन यात्रा
सत्कर्म कीजिये , अपने परिवार, दोस्तों, को वक़्त दे उनके सुख दुःख में शामिल हो और अपने क्रोध पे नियंत्रण करने का प्रयास करे. प्रत्न्य रहे की अपने जानकारी में कोई भूका न सो पाए किसी की आँखों में हमारे वजह से आंसू न आ जाये और हम किसी जीव के कष्ट का कारण न बने . जीवन के छोटे छोटे लम्हों का आनंद ले ,बरखा की बौछारों का, शबनम की बूंदों का, सूरज की किरणों का और चाँद की दुधिया रौशनी का भी, तो अमावस्या की अँधेरे का भी . सुख का तो दुःख भी प्रेम और नफरत दोनों का क्यों कि सब कुछ गुजर रहा हैं बहुत तेजी से और हमे पता तक नहीं चल रहा. हम मनुष्य हैं ,फिर पता नहीं क्या होंगे? कौन जाने इनका आन्नद लेने का और व्यक्त करने का मौका मिले न मिले . अपने प्रतेक दिन को यादगार बनाने की कोशिश करे , ईश्वर और पुरे मानव जाति और इस सृष्टी के प्रति कृतज्ञ रहे जो, हमको ये मौका मिला हैं ,ये किसी पूजा गृह में जाने से अच्छा हैं की अपने मन -वचन और कर्म को ही मंदिर सा पवित्र रखे , शायद यहाँ से अलविदा लेते वक़्त सुकून रहे , जीवन का आनंद ले तो मृत्यु के ले लिए हमेशा तैयार , बड़े बड़े काव्य , ग्रन्थ लिख दिए गए , फिर भी मानव अब तक परेशां हैं , क्यों कि मानव ने लिखा और अपने अपने लिखे को श्रेष्ठ साबित करने में लगा रहा , पर यात्रा में सब मुसाफिर होते हैं , कोई बड़ा कोई छोटा नहीं , किसी को सीट मिल जाती हैं तो किसी को नहीं मिलती , तो सफ़र को क्यों और कष्टमय बनाया जाये , सफ़र करते हैं ...
शुक्रवार, 28 जनवरी 2011
दो बुँदे
वो बुँदे न बरखा की थी ना
ना शबनम की
फिर भी गिर जाती है
यदा कदा ,
नहीं जानते कहाँ से आ जाती है वो नमी ,
बना जाती है जो चेहरे को सर्द और आँखों को सुखा ,
फिर हम जीने लगते है
एक अधूरी ही दुनिया में जहाँ न सपने हैं न उम्मीद की कोई किरण ,
फिर भी उसे जीना हैं मुक़दर मेरा ..
ईश्वर का अस्त्तिव तलाशते तलाशते खुद गवा बैठे अपना अस्तित्व ,
नहीं समझ में आती दुनिया की बाते ,
ढकोसले ,और पाखंड ,
और वो जीने नहीं देते सादगी से ,
ना शबनम की
फिर भी गिर जाती है
यदा कदा ,
नहीं जानते कहाँ से आ जाती है वो नमी ,
बना जाती है जो चेहरे को सर्द और आँखों को सुखा ,
फिर हम जीने लगते है
एक अधूरी ही दुनिया में जहाँ न सपने हैं न उम्मीद की कोई किरण ,
फिर भी उसे जीना हैं मुक़दर मेरा ..
ईश्वर का अस्त्तिव तलाशते तलाशते खुद गवा बैठे अपना अस्तित्व ,
नहीं समझ में आती दुनिया की बाते ,
ढकोसले ,और पाखंड ,
और वो जीने नहीं देते सादगी से ,
लोकतंत्र के छेद ,जो दिखते नहीं डुबोते हैं ..
छोटी छोटी बाते जो बहूत बड़ी हैं , पर इसके लिए कोई न ही वैचारिक विमर्श होते हैं , न ही चर्चाये , १. हम जैसे युवाओ को किसी नौकरी के लिए फार्म भरना होता हैं तो हम अपने प्रमाण पत्रों को किसी राज पत्रित अधिकारी के पास निरिक्षण के लिए ले जाते हैं , कई बार ओ हमे जलील(अनेको प्रकार से कभी हमारी योगता पे सवाल लगा के , कभी दोस्तों या सहकर्मियों से बतियाते हुए और हमे इन्तजार करते हुए ) कर देते है तो कुछ लोग मूल अंक पत्रों से मिला के हस्ताक्षर कर देते हैं , देखने में ये बहूत छोटी बात हैं पर इसका मंतव्य क्या हैं ? क्या सरकार को अपने ही खोले हुए विद्यालयों और विश्वविद्यालयओ पे भरोसा नहीं हैं , या ये उन अध्यापको, उन संस्थाओ का परिहास नहीं हैं जिनके द्वारा पढाये हजारो छात्र आज देश की सेवा कर रहे हैं , और वो भी कही राज पत्रित अधिकारी हैं .
जिनके कुलपति औरआचार्यो और प्राचार्य महोदय लोगो की विद्वता का लोहा दुनिया जान चुकी हैं . मेरे समझ से ये अंग्रेजो के ज़माने से आ रही परम्परा हैं जो उन्होंने भारतीय लोगो के लिए की होंगी , ताकि उनकी श्रेष्ठता बनी रहे , अगर आज के युग में दुनिया इतनी आधुनिक हो गई है तो सरकार को शैक्षिक प्रमाण पत्रों की विश्वनीयता के लिए कोई और कदम उठाना चाहिए .
२.अपने ही चित्र को किसी राज पत्रित अधिकारी से प्रमाणित करवाना ,की ये मैं ही हूँ
3.अस्पतालों में मरीज लोग पर्ची के लिए लाइन लगते हैं , मैंने देखा है कई बार ज्यादे बीमार लोग जिनके साथ कोई नहीं होता वो लाइन में लगे होते हैं और हलके फुल्के बीमार लोग फटा फट पर्ची ले के चले जाते हैं , सरकार का कर्तव्य , जैसा मैंने पढ़ा हैं किताबो में अपने नागरिको का जीवन सरल बनाना है ,उलटे सरकार आम आदमी की जिंदगी को कष्टकर बना बैठी है, अगर यही जीवन हैं तो स्कूलों में पढाये जाने वाले उन किताबो से इन निमयो , कानूनों और नैतिकता की बातो को निकल देना चाहिए . उन किताबो को जला देना चाहिए जो हमे सत्य , अहिंसा , परोपकार और सभ्यता की बाते सिखाती हैं , क्यों की जीवन में जब ये भ्रम टूटते है तो दुःख होता हैं और आदमी वही से भ्रष्ट होने लगता हैं
4.राशन कार्ड , ड्राइविंग लाइसेंस , वोटर कार्ड और जन्म - मृत्यु प्रमाण पत्रों में (जिन्हें अक्सर लोग दर्ज कराते ही नहीं , जो करवाते हैं उनके हाल ) गलत सूचनाये भर देना ( जैसे गलत नाम , पता , उम्र या माता पिता का नाम ) , फिर इनको ठीक करने के लिए न्यायलय के शपथ पत्र देना , की मैं ही वास्तविक व्यक्ति हूँ .
५.भारत देश जनसख्या के मामले में विश्व में दुसरे नंबर पे हैं पर जनसख्या को नियंत्रित करने के लिए कोई व्यापक संसाधन नहीं , भारतीय रेलवे से ले कर , सार्वजनिक जगहों तक , यहाँ तक की अब तो शोपिंग मालों में भी अच्छी खासी भीड़ हो रही हैं जहाँ से किसी दुर्घटना के वक़्त निकलना टेडी खीर हैं.
सोमवार, 17 जनवरी 2011
मेरी तकदीर
तुम चाँद हो
एक ख्वाब हो
एक किनारा
और मेरी तकदीर में
हैं बस
चाँद को ताकना
ख्वाब को सहेजना
और कश्ती का डूब जाना
तुम बरखा की बुँदे
और बसन्त का बाग़
मैं जेठ की धरती
और सुखी घास ....
एक ख्वाब हो
एक किनारा
और मेरी तकदीर में
हैं बस
चाँद को ताकना
ख्वाब को सहेजना
और कश्ती का डूब जाना
तुम बरखा की बुँदे
और बसन्त का बाग़
मैं जेठ की धरती
और सुखी घास ....
रविवार, 16 जनवरी 2011
मैं
कितने अलहदा हैं मेरे
हालत और ज़ज्बात
दुसरो से ..
हालत मेरे कुछ करने नहीं देते
ज़ज्बात मेरे चुप रहने नहीं देते ..
इसी कशमकश में ...
चार लफ्जों को ..
अफ़साने का शक्ल दे कर
हो जाता हूँ फ़ारिग
हालत और ज़ज्बात
दुसरो से ..
हालत मेरे कुछ करने नहीं देते
ज़ज्बात मेरे चुप रहने नहीं देते ..
इसी कशमकश में ...
चार लफ्जों को ..
अफ़साने का शक्ल दे कर
हो जाता हूँ फ़ारिग
वक़्त
वक़्त बदल गया हैं,
पर ज़ज्बात वही हैं
उम्र बढ गई हैं
पर औकात वही हैं
सोचता हूँ अब भी
उम्र गुजर गई रिश्तो- रस्मो
को निभाने में
पर रिश्तों की बात वही हैं
आज भी रिसते हैं ज़ख्म मेरे
क्यों कि रिश्तों की मार वही हैं
पर ज़ज्बात वही हैं
उम्र बढ गई हैं
पर औकात वही हैं
सोचता हूँ अब भी
उम्र गुजर गई रिश्तो- रस्मो
को निभाने में
पर रिश्तों की बात वही हैं
आज भी रिसते हैं ज़ख्म मेरे
क्यों कि रिश्तों की मार वही हैं
एक जज्बात
गर्दिश इन्सा को क्या से क्या बना देता हैं,
एक भावुक , संवेदनशील को मुर्दा बना देता हैं ,
गर्दिशो में बने रिश्ते बड़े अनमोल हैं ,
तख्तो- ताज से कीमती उस वक़्त के मीठे बोल हैं ,
इंसा -इंसा के काम आ जाये तो जीवन भी सफल हैं ,
जैसा मैंने भारत को देखा
पेट में अन्न का दाना नहीं हैं
सर पे तपती जेठ की दोपहरी हैं
और कंधे पे सीमेंट की बोरी हैं ,
दिन भर कमाने के बाद भी मिलती नहीं मजूरी हैं .
और इंडिया बसता हैं ऊचे -२ घरो में
जहाँ गर्मी और सर्दी का कोई फर्क नहीं ,
बरसात की कीचड़ कोई गर्क नहीं ,
लोग अर्पित कर आते हैं मंदिरों में करोडो रुपये,
और सोने -चांदी के जेवर
अपने ईश्वर को खुश करने को
और उसी के रचे बन्दों से करते हैं नफरत
कभी जाती , कभी धरम और कभी गरीबी के नाम पर
और अब तो ईश्वर को भी कोई अफ़सोस नहीं हैं
उसको भी इन्सान का एक बहाना मिल गया हैं ,
और दुनिया को एक नया ज़माना मिल गया हैं
एक भावुक , संवेदनशील को मुर्दा बना देता हैं ,
गर्दिशो में बने रिश्ते बड़े अनमोल हैं ,
तख्तो- ताज से कीमती उस वक़्त के मीठे बोल हैं ,
इंसा -इंसा के काम आ जाये तो जीवन भी सफल हैं ,
जैसा मैंने भारत को देखा
पेट में अन्न का दाना नहीं हैं
सर पे तपती जेठ की दोपहरी हैं
और कंधे पे सीमेंट की बोरी हैं ,
दिन भर कमाने के बाद भी मिलती नहीं मजूरी हैं .
और इंडिया बसता हैं ऊचे -२ घरो में
जहाँ गर्मी और सर्दी का कोई फर्क नहीं ,
बरसात की कीचड़ कोई गर्क नहीं ,
लोग अर्पित कर आते हैं मंदिरों में करोडो रुपये,
और सोने -चांदी के जेवर
अपने ईश्वर को खुश करने को
और उसी के रचे बन्दों से करते हैं नफरत
कभी जाती , कभी धरम और कभी गरीबी के नाम पर
और अब तो ईश्वर को भी कोई अफ़सोस नहीं हैं
उसको भी इन्सान का एक बहाना मिल गया हैं ,
और दुनिया को एक नया ज़माना मिल गया हैं
गुरुवार, 17 जून 2010
मेरी पहचान
मैं एक नादाँ इन्सान हूँ ..
जो दे देता है सीट बसों और ट्रेनों में
बुजुर्गो और औरतों को ,
करता नहीं धक्का मुक्की
चढते -उतरते वक़्त बसों में , बाजार ,मेलो में
करता हूँ लाइनों में अपनी बारी की प्रतीक्षा ,
अपने सहयोगी मित्रो की करता हूँ मदद ,
बिना ये सोचे की
ये बड़ा - छोटा काम है ..
बोल जाता हूँ ..सबको आप और
देता हूँ हर इन्सान को एक इन्सान की इज्जत
बिना उसके पद और अमीरी की चिंता किये
ऑफिस में ले लेता हूँ अपने लिए पानी,
इन्तजार किये बगैर ऑफिस बॉय की
और दिखता हूँ मैं , जैसा मैं हूँ
करता हूँ अच्छे परम्पराओं और नैतिक मूल्यों का सम्मान
करता हूँ जब अपने मातृ-भाषा में बाते
और कभी संघर्षो को अपने करता हूँ याद
तो ..........
मेरे पिछड़े पन की खुल जाती है पोल
और हँसते है लोग मेरी नादानी पे
की ये किस दुनिया का वासी है?
यही मेरी बेवकूफी का प्रत्यक्ष प्रमाण है ?
और शायद हो गया हूँ मैं पागल भी
जो कर जाता है खिलाफत हर अन्याय का ,
सोच लेता हूँ अपने आस - पास की घटनाओ के बारे में
ऐसा क्यों हो रहा हैं ?
और हूँ मैं एक कायर भी ?
जो करता है अहिंसा में विश्वास
धरम के नाम पे बचता हूँ दिखावे से
तो हो गया मैं नास्तिक.. भी
शायद मुझ जैसो के लिए अब ये दुनिया नहीं रही
शायद हम बोझ हो गए हैं मानवता पर
क्यों कि अब मानवता के मायने बदल गए है .
और अब सारें नादाँ संभल गए हैं ....
जो दे देता है सीट बसों और ट्रेनों में
बुजुर्गो और औरतों को ,
करता नहीं धक्का मुक्की
चढते -उतरते वक़्त बसों में , बाजार ,मेलो में
करता हूँ लाइनों में अपनी बारी की प्रतीक्षा ,
अपने सहयोगी मित्रो की करता हूँ मदद ,
बिना ये सोचे की
ये बड़ा - छोटा काम है ..
बोल जाता हूँ ..सबको आप और
देता हूँ हर इन्सान को एक इन्सान की इज्जत
बिना उसके पद और अमीरी की चिंता किये
ऑफिस में ले लेता हूँ अपने लिए पानी,
इन्तजार किये बगैर ऑफिस बॉय की
और दिखता हूँ मैं , जैसा मैं हूँ
करता हूँ अच्छे परम्पराओं और नैतिक मूल्यों का सम्मान
करता हूँ जब अपने मातृ-भाषा में बाते
और कभी संघर्षो को अपने करता हूँ याद
तो ..........
मेरे पिछड़े पन की खुल जाती है पोल
और हँसते है लोग मेरी नादानी पे
की ये किस दुनिया का वासी है?
यही मेरी बेवकूफी का प्रत्यक्ष प्रमाण है ?
और शायद हो गया हूँ मैं पागल भी
जो कर जाता है खिलाफत हर अन्याय का ,
सोच लेता हूँ अपने आस - पास की घटनाओ के बारे में
ऐसा क्यों हो रहा हैं ?
और हूँ मैं एक कायर भी ?
जो करता है अहिंसा में विश्वास
धरम के नाम पे बचता हूँ दिखावे से
तो हो गया मैं नास्तिक.. भी
शायद मुझ जैसो के लिए अब ये दुनिया नहीं रही
शायद हम बोझ हो गए हैं मानवता पर
क्यों कि अब मानवता के मायने बदल गए है .
और अब सारें नादाँ संभल गए हैं ....
बुधवार, 19 मई 2010
एक ज़ज्बात
दुनिया बनाने वाले क्या तू कही है ?
अगर है ,तो तेरी इस दुनिया में
तेरी औलादे इतनी ज़ालिम क्यों है ?
इक तरफ चमचमाती इमारते तो
दूसरी तरफ खंडहरात क्यों है?
किसी के घरो में दो वक़्त की रोटी नहीं
और किसी के घरो में भरे हीरे - जवाहरात क्यों है ?
इक तरफ गरीबी ,भूक ,लाचारी, और बेबसी
की अँधेरी रात , तो दूसरी ओर
एशो -आराम की खिली चांदनी रात क्यों है?
अगर है तो क्यों नहीं समझाता अपने बन्दों को
मत बहाए तेरे नाम पे तेरे ही बन्दों का खून
की ये तेरी ही बनाई कायनात है
दुनिया कहने लगी है मुझे पागल
पर तू तो बता क्या मेरे नसीब में
तुझसे मुलाकात तो है ?
अगर है ,तो तेरी इस दुनिया में
तेरी औलादे इतनी ज़ालिम क्यों है ?
इक तरफ चमचमाती इमारते तो
दूसरी तरफ खंडहरात क्यों है?
किसी के घरो में दो वक़्त की रोटी नहीं
और किसी के घरो में भरे हीरे - जवाहरात क्यों है ?
इक तरफ गरीबी ,भूक ,लाचारी, और बेबसी
की अँधेरी रात , तो दूसरी ओर
एशो -आराम की खिली चांदनी रात क्यों है?
अगर है तो क्यों नहीं समझाता अपने बन्दों को
मत बहाए तेरे नाम पे तेरे ही बन्दों का खून
की ये तेरी ही बनाई कायनात है
दुनिया कहने लगी है मुझे पागल
पर तू तो बता क्या मेरे नसीब में
तुझसे मुलाकात तो है ?
शुक्रवार, 12 मार्च 2010
विचित्र है जिंदगी .............
यक़ीनन जिंदगी अजीब पहेली है , जितना सुलझाओ उतनी उलझती जाती है. धर्म - अधरम , जीवन - मृत्यु , सच - झूठ , सही -गलत से जरुरी होता है , इन सांसो कि डोर को संभालना , लेकिन कभी - कभी जिंदगी इतनी निराशा से भर जाती है , कि इक साँस जीवन पे भरी हो जाता है.
क्या जीना इतना जरुरी होता है कि मृत्यु से भी कष्टकर दुखो को झेलते हुए मनुष्य जीना चाहता है ?
जिंदगी से टूटे हुए आदमी के विचार कभी कभी जिंदगी का इक नया फलसफा सिखा देते है.मैंने अभी हाल ही में देखा कि लोग भीख भी अपने स्वार्थ के लिये देते है . क्यों कि अभी मै कम उम्र हूँ , तो जिंदगी के तजुर्बे सिख रहा हूँ . मैंने जिंदगी से सिखा कि जिंदगी अपने सबसे अजीज को कभी इतना गैर बना देती है , कि हम उसे ठीक से देख भी नहीं सकते , जिसके सुख दुःख के साथी रहे ओ गैर हो जाता है , उसकी परझाई भी इतनी बेगानी हो जाती है कि ओ छुई नहीं जाती . उसके कदमो कि धुल किसी भभूती से कम नहीं होती ... ये क्या है ? कितनी विचित्र है जिंदगी ............
मैंने सिखा इस जिंदगी से कि ..
१.हालत आपका भाग्य तय करते है , हालत कुछ हद तक हम बनाते है , कुछ विधि रच देती है . जिसके अनुसार तय होता है कि हमारे जीवन में प्रेम , घृणा , वात्सल्य और मानव मन के अन्य राग .
२. बचपन जीवन का ओ हिस्सा है जहाँ से हम वीर - कायर , ईमानदार- बेईमान , सज्जन और दुर्जन बनते है . प्रेम - ईर्ष्या , छल -कपट और विश्वास कि नींव भी यही पड़ती है . जब कोई बात हमारे आशा के विपरीत होती है तो हमे दुःख होता है .
अर्थात उम्मीदों का टूटना ही दुःख का कारण है , तो उम्मीद ही क्यों पाली जाये .
और जीवन का सत्य मृत्यु............ मृत्यु का कारण हर बार विधाता ही नहीं होता , और हर बार मनुष्य ही नहीं होता , और भी बड़े मानवीय कारण है जो हमारे जीवन का निर्धारण कर देते है और कई मामलो में तो हमारे अपने माता- पिता ही हमारे मौत का कारण बन जाते है . जैसे कोई अनुवांशिक बीमारी , कोई लत या कुछ ऐसा जो उन्होंने हमे विरासत में दिया हो , चाहे दुश्मनी , बीमारी या दौलत ...........
कई मामलो में मैंने देखा कि माता - पिता कई बार इतने आदरणीय नहीं होते जितना हमारे बुजुर्गो ने उन्हें बताया है . .. खैर मिलते है कुछ नए विचारो के साथ तब तक के लिये ... शुभ अलविदा ...... कुछ गलत हो तो प्लीज हमे बताये .और क्षमा करे ...
आपका अपना
ही गैर ....
क्या जीना इतना जरुरी होता है कि मृत्यु से भी कष्टकर दुखो को झेलते हुए मनुष्य जीना चाहता है ?
जिंदगी से टूटे हुए आदमी के विचार कभी कभी जिंदगी का इक नया फलसफा सिखा देते है.मैंने अभी हाल ही में देखा कि लोग भीख भी अपने स्वार्थ के लिये देते है . क्यों कि अभी मै कम उम्र हूँ , तो जिंदगी के तजुर्बे सिख रहा हूँ . मैंने जिंदगी से सिखा कि जिंदगी अपने सबसे अजीज को कभी इतना गैर बना देती है , कि हम उसे ठीक से देख भी नहीं सकते , जिसके सुख दुःख के साथी रहे ओ गैर हो जाता है , उसकी परझाई भी इतनी बेगानी हो जाती है कि ओ छुई नहीं जाती . उसके कदमो कि धुल किसी भभूती से कम नहीं होती ... ये क्या है ? कितनी विचित्र है जिंदगी ............
मैंने सिखा इस जिंदगी से कि ..
१.हालत आपका भाग्य तय करते है , हालत कुछ हद तक हम बनाते है , कुछ विधि रच देती है . जिसके अनुसार तय होता है कि हमारे जीवन में प्रेम , घृणा , वात्सल्य और मानव मन के अन्य राग .
२. बचपन जीवन का ओ हिस्सा है जहाँ से हम वीर - कायर , ईमानदार- बेईमान , सज्जन और दुर्जन बनते है . प्रेम - ईर्ष्या , छल -कपट और विश्वास कि नींव भी यही पड़ती है . जब कोई बात हमारे आशा के विपरीत होती है तो हमे दुःख होता है .
अर्थात उम्मीदों का टूटना ही दुःख का कारण है , तो उम्मीद ही क्यों पाली जाये .
और जीवन का सत्य मृत्यु............ मृत्यु का कारण हर बार विधाता ही नहीं होता , और हर बार मनुष्य ही नहीं होता , और भी बड़े मानवीय कारण है जो हमारे जीवन का निर्धारण कर देते है और कई मामलो में तो हमारे अपने माता- पिता ही हमारे मौत का कारण बन जाते है . जैसे कोई अनुवांशिक बीमारी , कोई लत या कुछ ऐसा जो उन्होंने हमे विरासत में दिया हो , चाहे दुश्मनी , बीमारी या दौलत ...........
कई मामलो में मैंने देखा कि माता - पिता कई बार इतने आदरणीय नहीं होते जितना हमारे बुजुर्गो ने उन्हें बताया है . .. खैर मिलते है कुछ नए विचारो के साथ तब तक के लिये ... शुभ अलविदा ...... कुछ गलत हो तो प्लीज हमे बताये .और क्षमा करे ...
आपका अपना
ही गैर ....
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
ख़्वाब
इक बार फिर ख़्वाब पलकों पे सजने लगे हैं .....
कुछ दिये उम्मीदों के दिल में जलने लगे हैं ,
किस मोड़ पे जिंदगी एक बार फिर हमे लायी है
जानते है हम कि, हम इक "गैर" हैं
जिसका खुशियों से जन्मो का बैर है
अबकी खुले जो लब हँसी को पाने के लिए
आंसू फिर गिरेंगे उनको भुलाने के लिये..
क्यों कि कुछ ख़्वाब तो होते ही है ...
...
टूट जाने के लिये !
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